उछलती धवल गंग की धार, बनाती हों यमुना गम्भीर।
सुन रहे हों नित नवल पुकार, भारती का भारत के धीर।
जहां पावन नदियों का मेल, पुण्य बरसाता संगम तीर।
पाप हरने का होता खेल, मिले पावन गंगा का नीर।
घाघरा, गंगा, यमुना आदि, जहां नदियों का मिले दुलार।
वही है अपना भारत देश, जहां की संस्कृति अमिट अपार।
मनुजता का देती सन्देश, सिखाती सबसे करना प्यार।
जहां पर आते हैं भगवान, सभी का करते हैं उद्धार।
समस्याओं को पीछे छोड़, लक्ष्य सामने रखो हे वीर।
कर्मयुत जीवन में तज आस, धन्य कर दो यह अधम शरीर।
Thursday, September 30, 2010
चेतना शक्ति
भूतल पर क्यों भार बने हो, शक्ति-पुत्र निर्बल होकर।
सुप्त पड़ी है क्यों चेतनता, तन मन से दुर्बल होकर।
दीन बने हो क्यों सोचो, संघर्षयुक्त जीवन खोकर।
मन मलीन है क्यों सोचो, कब तक जागोगे सोकर।
दीप-ज्योति क्यों बुझी हुई है, तम-रिपु से लोहा लेकर।
अर्जित किया हुआ है क्या, जो जाओगे युग को देकर।
जब युवा अवस्था स्वीकारा, अपना अमूल्य बचपन देकर।
तो खुश रहकर जीना सीखो, अपना नश्वर जीवन देकर।
जनमानस तुझे पुकारेगा, नित नई अपेक्षाएं लेकर।
जीवन को जीना है कब तक, मन में ही इच्छाएं लेकर।
क्रियाशीलता की गति को, कब इच्छाशक्ति पुकारेगी।
चेतनाशक्ति जीवन उपवन को, आकर सहज संवारेगी।
सुप्त पड़ी है क्यों चेतनता, तन मन से दुर्बल होकर।
दीन बने हो क्यों सोचो, संघर्षयुक्त जीवन खोकर।
मन मलीन है क्यों सोचो, कब तक जागोगे सोकर।
दीप-ज्योति क्यों बुझी हुई है, तम-रिपु से लोहा लेकर।
अर्जित किया हुआ है क्या, जो जाओगे युग को देकर।
जब युवा अवस्था स्वीकारा, अपना अमूल्य बचपन देकर।
तो खुश रहकर जीना सीखो, अपना नश्वर जीवन देकर।
जनमानस तुझे पुकारेगा, नित नई अपेक्षाएं लेकर।
जीवन को जीना है कब तक, मन में ही इच्छाएं लेकर।
क्रियाशीलता की गति को, कब इच्छाशक्ति पुकारेगी।
चेतनाशक्ति जीवन उपवन को, आकर सहज संवारेगी।
बापू की संघर्ष यात्रा
संघर्ष यात्रा में मरना, जिसने स्वीकार किया था।
सत्य अहिंसा युक्त हृदय, दुनिया से प्यार किया था।
वह गांधी नाम हृदय में सबके, तब तक अमर रहेगा।
जब तक पृथ्वी के आंचल में जीवन सफर चलेगा।
अस्त्र विहीन साहसी सैनिक सेना को ललकारे।
विजयश्री ले लिए सहज ही भारत मां के प्यारे।
आजादी का वृक्ष उन्होंने अपने खून से सींचा।
यही हमें दायित्व दे दिए, कभी न हो सिर नीचा।
जीवन मुक्त हुए पर हममें, वे निवास करते हैं।
इसीलिए भीगी आंखों से सभी याद करते हैं।
सत्य अहिंसा युक्त हृदय, दुनिया से प्यार किया था।
वह गांधी नाम हृदय में सबके, तब तक अमर रहेगा।
जब तक पृथ्वी के आंचल में जीवन सफर चलेगा।
अस्त्र विहीन साहसी सैनिक सेना को ललकारे।
विजयश्री ले लिए सहज ही भारत मां के प्यारे।
आजादी का वृक्ष उन्होंने अपने खून से सींचा।
यही हमें दायित्व दे दिए, कभी न हो सिर नीचा।
जीवन मुक्त हुए पर हममें, वे निवास करते हैं।
इसीलिए भीगी आंखों से सभी याद करते हैं।
जीवन के नाटक का मंचन
हे दीप तुम्हारा अभिनन्दन, हे ज्योति तुम्हारा अभिनन्दन।
जीवन जन-जन का दीप तुम्ही, हर गति का कारण ज्योति तुम्ही।
कर जोर सभी करते रहते, हे दीप-ज्योति तेरा वन्दन।
हे दीप तुम्हारा अभिनन्दन--------
जीवन का दीपक जलता है, व्यक्तित्व प्रकाश निकलता है।
ज्लाला बिखेरती तेज पुंज, अधबुझे दीप करते क्रन्दन।
हे दीप तुम्हारा अभिनन्दन--------
दीपक दुनिया में आते हैं, इतिहास छोड़कर जाते हैं।
दीपक की ज्योति तुम्हारा तो, युग-युग होता रहता चिन्तन।
हे दीप तुम्हारा अभिनन्दन--------
यह सृष्टि तुम्ही हर दृष्टि तुम्ही, यह जीवन मंच तुम्हारा है।
तेरे प्रकाश में होता है, जीवन के नाटक का मंचन।
हे दीप तुम्हारा अभिनन्दन--------
जीवन जन-जन का दीप तुम्ही, हर गति का कारण ज्योति तुम्ही।
कर जोर सभी करते रहते, हे दीप-ज्योति तेरा वन्दन।
हे दीप तुम्हारा अभिनन्दन--------
जीवन का दीपक जलता है, व्यक्तित्व प्रकाश निकलता है।
ज्लाला बिखेरती तेज पुंज, अधबुझे दीप करते क्रन्दन।
हे दीप तुम्हारा अभिनन्दन--------
दीपक दुनिया में आते हैं, इतिहास छोड़कर जाते हैं।
दीपक की ज्योति तुम्हारा तो, युग-युग होता रहता चिन्तन।
हे दीप तुम्हारा अभिनन्दन--------
यह सृष्टि तुम्ही हर दृष्टि तुम्ही, यह जीवन मंच तुम्हारा है।
तेरे प्रकाश में होता है, जीवन के नाटक का मंचन।
हे दीप तुम्हारा अभिनन्दन--------
धूप और छांव
तुम्ही धूप हो तुम्ही छांव हो, जहां बसे घर वही गांव हो।
हमको प्यारा नेह तुम्हारा, तुम्ही हो नदिया तुम्ही किनारा।
पार मुझे ले जाने वाले, तुम्ही तो केवट तुम्ही नाव हो।
तुम्ही धूप हो तुम्ही छांव हो---------
तुम्ही मुझे दुनिया में लाए, मन में आशा-दीप जलाए।
आशा और निराशा तम में, तुम्ही प्रेरणा ज्योति जगाए।
जब जीवन में जगह न मिलती, ऐसे पल में तुम्ही ठांव हो।
तुम्ही धूप हो तुम्ही छांव हो---------
भटक रहा था इस दुनिया में, अपने मन में तुझे न खोजा।
इसीलिए तो भेदभाव का, चिन्तन आया उसी को सोचा।
पड़ता जो सम्पूर्ण जगत पर, हे प्रभु जी तुम ही प्रभाव हो।
तुम्ही धूप हो तुम्ही छांव हो---------
हमको प्यारा नेह तुम्हारा, तुम्ही हो नदिया तुम्ही किनारा।
पार मुझे ले जाने वाले, तुम्ही तो केवट तुम्ही नाव हो।
तुम्ही धूप हो तुम्ही छांव हो---------
तुम्ही मुझे दुनिया में लाए, मन में आशा-दीप जलाए।
आशा और निराशा तम में, तुम्ही प्रेरणा ज्योति जगाए।
जब जीवन में जगह न मिलती, ऐसे पल में तुम्ही ठांव हो।
तुम्ही धूप हो तुम्ही छांव हो---------
भटक रहा था इस दुनिया में, अपने मन में तुझे न खोजा।
इसीलिए तो भेदभाव का, चिन्तन आया उसी को सोचा।
पड़ता जो सम्पूर्ण जगत पर, हे प्रभु जी तुम ही प्रभाव हो।
तुम्ही धूप हो तुम्ही छांव हो---------
Tuesday, August 31, 2010
तदपि कहे बिनु रहा न कोई
भगवान के बारे में शास्त्रों में विस्तार से बताया गया है। यह भी कहा गया है कि उनके बारे में सम्पूर्णता से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। तभी तो समस्त शास्त्र, वेद और पुराण नेति-नेति कह कर भगवान की ओर संकेत भर करते हैं। नेति का मतलब ऐसा नहीं। फिर कैसा......बस यहीं पर मुशिकल आती है। तो फिर किया क्या जाए। क्या निराश हो जाएं कि जब भगवान के बारे में कुछ कहा ही नहीं जा सकता, तो क्यों दिमाग खपाएं, लेकिन शास्त्र कहते हैं कि जिससे जितना बन पड़े, भगवान के बारे में चिन्तन जरूर करे। यही चिन्तन भजन बन जाता है, जिसका बहुत बड़ा प्रभाव है। इसका प्रमाण श्रीरामचरित मानस के बालकाण्ड की एक चौपाई में मिलता है।
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहे बिनु रहा न कोई।।
तहां वेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भांति बहु भाषा ।।
अर्थात-यद्यपि प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी प्रभुता को सब अकथनीय ही जानते हैं तथापि कहे बिना कोई नहीं रहा। इसमें वेद ने ऐसा कारण बताया है कि भजन का प्रभाव बहुत तरह से कहा गया है। भगवान के गुणगानरूपी भजनका प्रभाव बहुत ही अनोखा है, उसका नाना प्रकार से शास्त्रों में वर्णन है। थोड़ा सा भी भगवान का भजन सहज ही भवसागर से तार देता है।
वास्तव में चार स्थितियां भजन की ओर ले जाती हैं। एक धन-दौलत की इच्छा, दूसरी संकट से छुटकारे की चाह, तीसरी जिज्ञासा शांत करने की चाह और चौथी ज्ञान पाने की इच्छा। किसी भी स्थिति में भजन लाभकारी होता है। इसी प्रकार भजन पर चर्चा जारी रहेगी। कुछ आप कहें और कुछ हम। भजन से आपको कितना लाभ हो सकता है, इसके भी बहुत प्रमाण हैं, लेकिन सबसे बड़ा प्रमाण है-भजन आओ करके देखें। बस आज इतना ही।
-श्रीकान्त सिंह
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहे बिनु रहा न कोई।।
तहां वेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भांति बहु भाषा ।।
अर्थात-यद्यपि प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी प्रभुता को सब अकथनीय ही जानते हैं तथापि कहे बिना कोई नहीं रहा। इसमें वेद ने ऐसा कारण बताया है कि भजन का प्रभाव बहुत तरह से कहा गया है। भगवान के गुणगानरूपी भजनका प्रभाव बहुत ही अनोखा है, उसका नाना प्रकार से शास्त्रों में वर्णन है। थोड़ा सा भी भगवान का भजन सहज ही भवसागर से तार देता है।
वास्तव में चार स्थितियां भजन की ओर ले जाती हैं। एक धन-दौलत की इच्छा, दूसरी संकट से छुटकारे की चाह, तीसरी जिज्ञासा शांत करने की चाह और चौथी ज्ञान पाने की इच्छा। किसी भी स्थिति में भजन लाभकारी होता है। इसी प्रकार भजन पर चर्चा जारी रहेगी। कुछ आप कहें और कुछ हम। भजन से आपको कितना लाभ हो सकता है, इसके भी बहुत प्रमाण हैं, लेकिन सबसे बड़ा प्रमाण है-भजन आओ करके देखें। बस आज इतना ही।
-श्रीकान्त सिंह
Friday, August 6, 2010
सहनशील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता
आप के कपड़े में लगी नील है जनता
महंगाई बढ़ा करके हमें क्या दिया तोफा
टूटी हमारी खाट भी खुद ले लिया सोफा
कामन न रहा वेल्थ हेल्थ खेल का बिगड़ा
जिसमें है फंसा देश वो है कर्ज का पिजड़ा
इसको न जड़ बनाओ ये गतिशील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता
फीका हुआ है आज अपनी चाय का प्याला
तुम छीनने लगे हो अब हर मुख का निवाला
तुम तो मनाओ दिवाली, अपना है दिवाला
सब कुछ तुम्हारी कैद में मस्जिद या शिवाला
इसको न सिखाओ, ये प्रगतिशील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता
सबूत खरीदो भले ताबूत बेच दो
इस देश को आधा या तुम साबूत बेच दो
ईमान बेच दो भले सम्मान बेच दो
आदमी तो क्या तुम भगवान बेच दो
पर आपके ताबूत की भी कील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता
हैं दागदार कर्म पर बेदाग बने हो
रोटी के हर टुकड़े के लिए काग बने हो
इस देश के संगीत का तुम राग बने हो
आस्तीन के तुम जाने कब से नाग बने हो
भूलो नहीं कि बहुत ज्वलनशील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता
आप के कपड़े में लगी नील है जनता
महंगाई बढ़ा करके हमें क्या दिया तोफा
टूटी हमारी खाट भी खुद ले लिया सोफा
कामन न रहा वेल्थ हेल्थ खेल का बिगड़ा
जिसमें है फंसा देश वो है कर्ज का पिजड़ा
इसको न जड़ बनाओ ये गतिशील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता
फीका हुआ है आज अपनी चाय का प्याला
तुम छीनने लगे हो अब हर मुख का निवाला
तुम तो मनाओ दिवाली, अपना है दिवाला
सब कुछ तुम्हारी कैद में मस्जिद या शिवाला
इसको न सिखाओ, ये प्रगतिशील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता
सबूत खरीदो भले ताबूत बेच दो
इस देश को आधा या तुम साबूत बेच दो
ईमान बेच दो भले सम्मान बेच दो
आदमी तो क्या तुम भगवान बेच दो
पर आपके ताबूत की भी कील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता
हैं दागदार कर्म पर बेदाग बने हो
रोटी के हर टुकड़े के लिए काग बने हो
इस देश के संगीत का तुम राग बने हो
आस्तीन के तुम जाने कब से नाग बने हो
भूलो नहीं कि बहुत ज्वलनशील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता
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